केरल की चुनावी जंग में इस बार चुनाव का रुख राज्य के मछुआरे तय करने वाले हैं. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी कोल्लम जिले में पिछले दिनों समुद्र में गोता लगाते और मछली पकड़ने वाले नेट लिए नजर आए थे. यह वही इलाका है, जहां बड़ी संख्या में मछुआरे रहते हैं और केरल की सियासत में अहम भूमिका अदा करते हैं.

केरल विधानसभा चुनाव की 140 सीटों पर मंगलवार यानी 6 अप्रैल को मतदान होना है. लेफ्ट के अगुवाई वाले एलडीएफ और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के बीच कांटे का मुकाबला है. केरल की चुनावी जंग में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की साख दांव पर लगी है और इस बार चुनाव का रुख राज्य के मछुआरे तय करने वाले हैं. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी कोल्लम जिले में पिछले दिनों समुद्र में गोता लगाते और मछली पकड़ने वाले नेट लिए नजर आए थे. यह वही इलाका है, जहां बड़ी संख्या में मछुआरे रहते हैं और केरल की सियासत में अहम भूमिका अदा करते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि राहुल मछुआरों के सहारे केरल चुनाव में करिश्मा दिखा पाएंगे?

केरल में 10 फीसदी मछुआरे हैं

केरल के समुद्रीय तटीय इलाके में बड़ी संख्या में मछुआरे रहते हैं. एक अनुमान के मुताबिक करीब 10 फीसदी मछुआरा समुदाय यहां के वोटर हैं, जो दक्षिण इलाके के कोल्लम, त्रिवेंद्रम, अल्लेप्पी, त्रिशूर, पोनानी और एर्नाकुलम जिले में निर्णायक भूमिका अदा करते हैं. इन इलाकों में लैटिन कैथोलिक मछुआरे बड़ी संख्या में रहते हैं. केरल की लगभग 4 दर्जन विधानसभा सीटों की किस्मत का फैसला मछुआरे करते हैं.

केरल का समुदाय तटीय इलाका एक समय कांग्रेस के अगुवाई वाले यूडीएफ का गढ़ हुआ करता था. मुछआरा समुदाय के लोग कांग्रेस के परंपरागत वोटर माने जाते थे, लेकिन पिछले कुछ चुनाव से वाममोर्चा ने उनके बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाई थी. केरल के तटीय क्षेत्रों में 47 विधानसभा सीट हैं, जहां पर हार-जीत का फैसला मछुआरा समुदाय करता है. इनमें से अधिकांश सीटें इस वक्त एलडीएफ के पास हैं. हालांकि, इस बार पिनराई विजयन सरकार के एक फैसले से मछुआरे वाम मोर्चा से नाराज माने जा रहे हैं.

लेफ्ट से आखिर क्यों नाराज है मछुआरे

एलडीएफ सरकार ने अमेरिकी फिशिंग कंपनी EMCC इंटरनेशनल के साथ 2950 करोड़ की डील की थी, जिसमें यह कंपनी समुद्र के अंदर मछली पकड़ने के लिए बड़े-बड़े जाल विकसित करेगी. राज्य सरकार के इस डील को लेकर मछुआरा समुदाय लेफ्ट से नाराज हैं. मछुआरों का मानना है कि वह पहले ही मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. ऐसे में गहरे समुद्र में मछली पकड़ने की योजना से उनकी आजीविका खत्म हो जाएगी. कांग्रेस के द्वारा मछुआरों की समस्याओं का चुनाव प्रचार का मुद्दा बनने से एलडीएफ बैक्रफुट पर है.

दरअसल, केरल में करीब 10 लाख मछुआरे हैं, जिनका जीवनयापन मछली पालन पर निर्भर करता है. राज्य में ज्यादातर महिलाएं हैं जो मछली का काम करती हैं. मछुआरे समुदाय के पुरुष समुद्र में मछली पकड़ते हैं और महिलाएं उसे बेचने का काम करती हैं. कोरोना संक्रमण के चलते मछुआरों का कारोबार भी ठप पड़ा है. डीजल कि बढ़ी कीमतों के चलते भी अधिकतर मछुआरे समुद्र में मछली पकड़ने जा ही नहीं रहे हैं. इन लोगों ने विजयन सरकार से स्पेशल पैकेज की मांग भी की थी लेकिन सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं आया. ऐसे में मछुआरा समुदाय में लेफ्ट से नाराज माने जा रहे हैं. ऐसे में मछुआरा समुदाय को यूडीएफ को साधना शुरू कर दिया है.

मछुआरों को कांग्रेस साधने में जुटी

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने समुद्र में गोता लगाया और मछुआरों के साथ मछली पकड़ने के साथ उनके लिए अलग मंत्रालय बनाने की मांग को उठाया. इसके साथ उन्होंने केरल चुनाव में यूडीएफ ने मछुआरों के लिए अलग घोषणा पत्र जारी किया, क्योंकि राहुल गांधी जानते हैं कि विधानसभा चुनाव में इस बार मछुआरे अहम भूमिका निभाएगें. माना जा रहा है कि राहुल गांधी के केरल में मछुआरों के साथ मछली पकड़ने का इन प्रदेशों की सीटों पर भी असर पड़ेगा. कांग्रेस किसी भी कीमत पर इस समुदाय को अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहती है.

राहुल गांधी ने कोल्लम में मछुआरों को संबोधित करते हुए कहा था कि जिस तरह किसान जमीन पर खेती करता है, उसी तरह आप भी समुद्र में खेती ही करते हैं. किसानों के पास तो दिल्ली में एक मंत्रालय है, लेकिन आपके पास नहीं है. राहुल गांधी ने वादा किया है कि अगर केरल में हमारी सरकार बनती है तो हम मछुआरों के लिए अलग से एक मंत्रालय रखेंगे ताकि आपके मुद्दों का बचाव और संरक्षण हो सके.

राहुल गांधी की मछुआरों के बीच सक्रियता और कांग्रेस के आक्रमक रूख को देखते हुए मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने डील तो अमेरिकन कंपनी के साथ कैंसिल कर दी, लेकिन मछुआरों की नाराजगी को दूर कर पाएंगे यह बड़ी चुनौती है. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि राहुल गांधी ने जिस तरह के केरल में मछुआरों के साथ लोकलुभावने वादे किए है, उसके पीछे साफ तौर पर राजनीतिक मकसद छिपा है. हालांकि, यह देखना होगा कि केरल विधानसभा चुनाव में राहुल मछुआरों के सहारे क्या राजनीतिक करिश्मा दिखा पाते हैं?