सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को दी मंजुरी. सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट में संसद की नई इमारत भी शामिल है. तीन जजों की बेंच में शामिल जस्टिस एएम खनविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच ने 2-1 के बहुमत से फ़ैसला सुनाया है.
साथ ही कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय से भविष्य की परियोजवनाओं में स्मॉग टावर लगाने के लिए कहा है. ख़ास करके उन शहरों में जहाँ प्रदूषण गंभीर मसला है. सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रोजेक्ट में पर्यावरण से जुड़ी सभी मंज़ूरियों को भी स्वीकार कर लिया है और ज़मीन के इस्तेमाल में बदलाव की अधिसूचना को भी हरी झंडी दे दी है.

आपको बता दें की जस्टिस खनविलकर और दिनेश माहेश्वरी ने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को अनुमति दी जबकि जस्टिस संजीव खन्ना ने इसके ख़िलाफ़ अपना फ़ैसला सुनाया है. जस्टिस संजीव खन्ना ने ज़मीन के इस्तेमाल में बदलाव को लेकर आपत्ति जताई है.

गौरतलब है कि पिछले दिनों ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई संसद की आधारशिला रखी थी. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उसे शिलान्यास करने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक कोई निर्माण, तोड़फोड़ या पेड़ गिराने या स्थानांतरित करने का काम ना हो. अब सुप्रीम कोर्ट लैंड यूज मामले में सुनवाई करेगा.

हाल हीं में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह तर्क दिया था कि 20 हजार करोड़ रुपये का सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पैसे की बर्बादी नहीं, बल्कि इससे धन की बचत होगी. इस प्रोजेक्ट से सालाना करीब एक हजार करोड़ रुपये की बचत होगी, जो फिलहाल दस इमारतों में चल रहे मंत्रालयों के किराये पर खर्च होते हैं. साथ ही इस प्रोजेक्ट से मंत्रालयों के बीच समन्वय में भी सुधार होगा. सरकार की तरफ से अपनी बात रखते हुये केन्द्र सरकार के वकील तुषार मेहता ने कहा था कि वर्तमान संसद भवन गंभीर आग की आशंका और जगह की भारी कमी का सामना कर रहा था. उन्होंने कहा कि प्रोजेक्ट के तहत हैरिटेज बिल्डिंग को संरक्षित किया जाएगा. मौजूदा संसद भवन 1927 में बना था जिसका उद्देश्य विधान परिषद के भवन का निर्माण था न कि दो सदन का था. उन्होंने कहा कि जब लोकसभा और राज्यसभा का संयुक्त सत्र आयोजित होता है, तो सदस्य प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठते हैं. इससे सदन की गरिमा कम होती है.