सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर रोक लगाने की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं को आज सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा. कोर्ट ने दोनों पर 1 लाख रुपए हर्जाना लगाने वाले दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को बदलने से मना किया. हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की नीयत पर सवाल उठाते हुए हर्जाना लगाया था. आज सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि याचिकाकर्ताओं ने कोरोना का हवाला दिया. लेकिन सभी निर्माण प्रोजेक्ट पर रोक की मांग नहीं की. उनकी मांग सिर्फ एक ही प्रोजेक्ट को लेकर थी. ऐसे में उनकी मंशा पर हाई कोर्ट की टिप्पणी सही थी.

आन्या मल्होत्रा और सोहैल हाशमी का कहना था कि काम जारी रहना प्रोजेक्ट में काम कर रहे मज़दूरों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है. इस याचिका को खारिज करते हुए 31 मई को दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि निर्माण कार्य में शामिल मजदूर उसी जगह पर रह रहे हैं. इस समय सेंट्रल विस्टा के जिस हिस्से का निर्माण चल रहा है उसका इस साल नवंबर तक पूरा होना ज़रूरी है ताकि गणतंत्र दिवस कार्यक्रम का आयोजन बिना किसी अड़चन के हो सके.

हाई कोर्ट के जस्टिस डी एन पटेल और ज्योति सिंह ने कहा था कि सेंट्रल विस्टा एक राष्ट्रीय महत्व की परियोजना है. लोगों को इसमें बहुत रुचि है. सुप्रीम कोर्ट भी इसे मंजूरी दे चुका है. दिल्ली में कई जगहों पर निर्माण कार्य चल रहा है. लेकिन याचिकाकर्ताओं ने उनकी बात नहीं की. सिर्फ राष्ट्रीय महत्व के इसी प्रोजेक्ट पर रोक की मांग की. उनकी मंशा असंदिग्ध नहीं कही जा सकती. इस टिप्पणी के साथ जजों ने दोनों पर 1 लाख रुपए का हर्जाना लगाया था.

दोनों ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की. उनकी तरफ से वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने दलील दी कि हाई कोर्ट का फैसला जनहित में सोचने वाले लोगों को हतोत्साहित करने वाला है.याचिकाकर्ताओं ने प्रोजेक्ट पर स्थायी रोक की मांग नहीं की थी. सिर्फ कुछ समय के लिए काम स्थगित करवाना चाहते थे. सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ए एम खानविलकर,  दिनेश माहेश्वरी और अनिरुद्ध बोस की बेंच ने काफी देर तक लूथरा की बातों को सुना. लेकिन उससे आश्वस्त नहीं हुए. उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने दिल्ली में चल रहे निर्माण कार्य पर कोई रिसर्च नहीं किया. उन्होंने सिर्फ एक निर्माण को रोकने के उद्देश्य से याचिका दाखिल की. ऐसे में हाई कोर्ट के आदेश में दखल देने की कोई ज़रूरत नहीं है.