भारत में 3 कंपनियों ने कोरोना वैक्सीन के इमरजेंसी इस्तेमाल की अर्जी दायर की है. इनमें फाइजर और एस्ट्राजेनेका विदेशी कंपनियां हैं जबकि भारत बायोटेक देसी कंपनी है।दरअसल, दुनिया में वैक्सीन का बाजार बहुत बड़ा नहीं है. जिन कंपनियों ने हाल ही में वैक्सीन बनाई भी है उनको भी इससे कोई खास मुनाफा नहीं होगा. अगर वैक्सीन के मार्केट का साइज देखें तो ये महज 24 अरब डॉलर का है, वहीं दवाओं का कुल बाजार 1 ट्रिलियन डॉलर का है.

यानी वैक्सीन को बनाने में भले ही कितना निवेश हुआ हो और कंपनियों के शेयरधारक भी कितने ही रिटर्न की उम्मीद रखें लेकिन इससे कंपनियों को बहुत कमाई नहीं है. कोरोना के मामले में तो सामाजिक दबाव ही इतना रहा है कि कंपनियां इसकी कीमत बहुत ज्यादा नहीं रख पाएंगी

इस बीच खबर आई है कि एस्ट्राजेनेका के लिए कीमत भी तय हो गई है. रिपोर्ट्स के मुताबिक सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया सरकार को एस्ट्राजेनेका का टीका 250 रुपए प्रति डोज के हिसाब से देगा.

इसके पहले निजी इस्तेमाल के लिए इसकी कीमत 1000 रुपए प्रति डोज होने की जानकारी आई थी. लेकिन सरकार करीब 30 करोड़ लोगों को वैक्सीन लगाने की योजना बना रही है जिससे बड़ी मात्रा में खरीदारी के चलते इसकी कीमत कम हो सकती है।

कंपनियों के हाथ में आने वाला मुनाफा मामूली ही रह सकता है. साथ ही ये रेवेन्यू भी 2 साल के लिए होगा इसके बाद कोरोना खत्म हो सकता है. अगर इस रेवेन्यू की तुलना फार्मा कंपनी मर्क की कैंसर ड्रग Keytruda से की जाए तो ये अकेली दवा इस कंपनी को हर साल 7 अरब डॉलर का रेवेन्यू दिलाती है।

हालांकि कोरोना वैक्सीन को बनाने में कंपनियों ने जो निवेश किया है उसमें mRNA की रिसर्च को आगे बढ़ाया गया है. उम्मीद है कि अब इस नई तकनीक की सफलता के आधार पर बाकी वैक्सीन को बनाना आसान होगा. साथ ही कई तरह की बीमारियों के इलाज के लिए दवा बनाने में ये तकनीक मददगार होगी. इससे कंपनियों को लॉन्ग टर्म में इस निवेश से बड़ा मुनाफा कमाने का मौका भी मिल सकता है।

कम कीमत में एक असरदार वैक्सीन बनाकर वो अपना ब्रैंड बना सकती हैं. वहीं अगर इनकी कीमत ज्यादा हुई और ये लोगों के साथ साथ सरकारों की पहुंच से भी दूर हो गईं तो फिर इन कंपनियों की ब्रैंड वैल्यू को बड़ा धक्का लग सकता है. अगर इससे होने वाली कमाई की बात करें तो फिर अनुमान है कि इससे कंपनियों को 10 अरब डॉलर सालाना की कमाई हो सकती है।