एसएन मेडिकल कॉलेज को सर्जरी की पढ़ाई के लिए आने वाले समय में 246 और महादानियों के मृत शरीर मिल जाएंगे। ये लोग पंजीकरण कराकर इसकी घोषणा कर चुके हैं। इनमें 27 साल के युवाओं से लेकर 92 साल के बुजुर्ग तक हैं। ऐसे जज्बे वाले लोगों की बदौलत की मेडिकल छात्रों को पढ़ाई के लिए शव मिल पा रहे हैं। फिलहाल यहां 12 शवों के जरिए सर्जरी का पाठ पढ़ाया जा रहा है।

एसएन के एनॉटमी विभागाध्यक्ष डॉ. वसुंधरा कुलश्रेष्ठ ने बताया कि देहदान के लिए लोग पंजीकरण करा रहे हैं। पिछले पांच सालों में 246 पंजीकरण हुए हैं। इनसे पहले पंजीकरण कराने वाले लोगों की मृत्यु होने पर शव मिले हैं। जरूरत पर फिरोजाबाद मेडिकल कॉलेज को भी एक शव पढ़ाई के लिए उपलब्ध कराया गया था। एसएन को आखिरी शव अक्तूबर 2019 में मिला था। पिछले साल कोरोना काल में कोई शव नहीं मिल सका।

शव विच्छेदन से 19 विभागों में पढ़ाई : डॉ. कमल
एनॉटमी विभाग के डॉ. कमल भारद्वाज ने बताया कि शव विच्छेदन मेडिकल पढ़ाई की रीढ़ है। इसमें चार साल में स्त्री रोग, हड्डी, नेत्र रोग, दंत रोग, पेट रोग, त्वचा रोग, बाल रोग समेत 19 विभागों में विशेषज्ञों के निर्देशन में पढ़ाई होती है।

एसएन में 1948 में पहला शव हुआ था दान
विभागाध्यक्ष ने बताया कि एसएन को पहला शव 1948 में दान में मिला था। यह शहर के प्रमुख संपन्न परिवार की महिला थीं। मानव सेवा में तत्पर रहने के कारण इनके परिजनों ने शव दान किया।

आगरा विकास मंच और क्षेत्र बजाजा कमेटी कर रही जागरूक
आगरा विकास मंच और क्षेत्र बजाजा कमेटी नेत्रदान के साथ देहदान के लिए जागरूक कर रहे हैं। इन्होंने 100 से अधिक लोगों के पंजीकरण कराए और शव दान कराए गए। मंच अध्यक्ष राजकुमार जैन और कमेटी अध्यक्ष सुनील विकल ने जागरुकता के कारण ही इतने शव मिल रहे हैं।

दो गवाहों समेत करनी होती है वसीयत
देहदान के लिए पंजीकरण फार्म होता है, इसमें देहदान करने वाले को दो गवाहों के हस्ताक्षर करने के साथ वसीयत करनी होती है। पंजीकरण होने के बाद कॉलेज की ओर से फोन नंबर दिया जाता है, मौत होने के बाद परिजनों को इस पर सूचना देनी होती है।
ये हैं महादानी
देहदान से मरकर भी मानव सेवा का मिलता रहे पुण्य: डॉ. रामअवतार शर्मा
डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलसचिव और समाजसेवी 90 साल के डॉ. रामअवतार शर्मा का कहना है कि मरने के बाद शव के जरिये छात्र पढ़ाई कर पारंगत होंगे और लोगों का इलाज करेंगे, ऐसे में उनका शव कितने लोगों के जीवन बचाने में काम आएगा। इस तरह से मरने के बाद भी मानव सेवा कर सकूंगा।

मौत के बाद मिट्टी है देह तो क्यों ने किसी के काम आ जाए: चंद्रेश गर्ग
बल्केश्वर निवासी 40 साल के उद्यमी चंद्रेश गर्ग ने देहदान के लिए दो साल पहले पंजीकरण कराया था। मरने के बाद तो शव मिट्टी होना है, इससे बेहतर है कि छात्र शव का विच्छेदन कर पढ़ाई करें और मानव जीवन बचाने के लिए इलाज कर सकेंगे।

कई बीमारियों का हो सकेगा इलाज: शिवानी मिश्रा
एचडीएफसी बैंक में डिप्टी मैनेजर बल्केश्वर केे शिवानी मिश्रा का कहना है कि कोरोना महामारी में तो अपनों ने भी शव को नहीं छुआ। ऐसे में मौत के बाद शव से चिकित्सकीय शोध हो सकेंगे, जिससे कई बीमारियों का इलाज पता चल सकेगा, यही भाव सोचकर देहदान को पंजीकरण कराया।

धर्मगुरुओं ने की देहदान की अपील
चिकित्सकीय शोध के लिए लावारिस शवों का इस्तेमाल किया जाए तो सबसे बेहतर है। इसके लिए प्रशासनिक अधिकारियों को पहल करनी चाहिए। साथ ही जो संन्यास दीक्षा ले चुके हैं, वह देहदान के लिए पंजीकरण करा सकते हैं। सनातन धर्म में इसका प्रावधान है। – योगेश पुरी, महंत मनकामेश्वर मंदिर

आत्मा अमर है और शरीर नश्वर, मृत्यु के बाद अगर शव से मेडिकल छात्र पढ़ाई करेंगे तो तमाम बीमारियों के इलाज की बारीकियां समझ सकेंगे। लोगों से अपील है कि देहदान करने के लिए पंजीकरण कराएं। – संत बाबा प्रीतम सिंह, गुरुद्वारा प्रमुख

मौत के बाद शरीर मिट्टी है, इसे कोई दफनाता है तो कोई अग्नि के सुपुर्द करता है। मेडिकल के छात्रों को पढ़ाई के लिए शवों की जरूरत है। लोग मानव सेवा के लिए देहदान का पंजीकरण कराएं। – फादर मून लाजरस
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