बस्तर के काजू पर ही ओडिशा की एक दर्जन से अधिक बड़ी यूनिट निर्भर हैं। बस्तर में उत्पादित काजू का संग्रहण बिचौलियों के जरिए हो रहा है। ये बिचौलिए बस्तर का काजू ओडिशा के जैपुर में खपा दे रहे हैं। यहां कच्चे माल का प्रोसेसिंग कर वे डेढ़ से दो गुना मुनाफा कमाकर मालामाल हो रहे हैं।

जगदलपुर. बस्तर जिले में करीब 8241 हजार हेक्टेयर भूमि पर काजू की पैदावार हो रही हैं। यहां काजू नट का सालाना उत्पादन छह हजार 655 क्विंटल के आसपास है। इतनी मात्रा में उत्पादन के बाद भी काजू प्रोसेसिग का कोई बड़ा प्लांट बस्तर में नहीं है। यहां प्रोसेसिंग नहीं होने से यह सारा माल ओडिशा के जैपुर में खपाया जा रहा है।

स्पष्ट है कि मुनाफा का बड़ा हिस्सा ओडिशा के हिस्से जा रहा है। बस्तर के काजू पर ही ओडिशा की एक दर्जन से अधिक बड़ी यूनिट निर्भर हैं। बस्तर में उत्पादित काजू का संग्रहण बिचौलियों के जरिए हो रहा है। ये बिचौलिए बस्तर का काजू ओडिशा के जैपुर में खपा दे रहे हैं। यहां कच्चे माल का प्रोसेसिंग कर वे डेढ़ से दो गुना मुनाफा कमाकर मालामाल हो रहे हैं। यदि यह यह सभी सुविधाएं होंगी तो संग्राहकों को तीन से चार करोड़ रुपए की कमाई आसानी से हो सकती थी।

11 हजार रुपए क्विंटल खरीदी, डेढ़ गुना कमा रहे मुनाफा

काजू के संग्रहण के बाद इसकी प्रोसेसिंग के कारोबार में डेढ़ से दो गुना मुनाफा है। बस्तर में बिचौलिए काजू को 11 हजार रुपए प्रति क्विंटल के भाव खरीद रहे हैं। जैपुर में प्रोसेसिंग कर इसका काजू बनाया जाता है, काजू के बाद बचे छीलन से तेल, कतरन से पालिश व अन्य बचे मटेरियल से जलाऊ बनाकर ये पाई-पाई वसूल कर रहे हैं। काजू बस्तर से ग्यारह हजार रुपए प्रति क्विंटल खरीद कर जैपुर जा रहा है। वह डेढ़ से दो गुना मुनाफा के साथ 18 हजार रुपए में वापस आ रहा है।

वनविभाग ने किया था ट्राइफेड से करार, नहंीं कर पाए आपूर्ति

ऐसा नहीं कि काजू संगहण, प्रोसेसिंग व उसके मार्केटिंग के लिए प्रयास नहीं किए गए। पिछले ही साल वन विभाग ने इसके मार्केटिंग के लिए ट्राइफेड से करार किया था। ट्राइफेड को बीस क्विंटल माल देना था। साल भर में भी विभाग न तो संग्रहण कर पाया न ही कोई बड़ी यूनिट होने से इसकी प्रोसेसिंग हो पाई। अंतत: यह करार रद्द हो गया है।

प्रोसेसिंग यूनिट खोलने के फिर से प्रयास जारी

बस्तर में काजू के बेहतर उत्पादन को देखते हुए जिला उद्योग केंद्र की मदद से बकावंड ब्लाक में तुरेनार, राजनगर सहित एक अन्य जगह पर तीन प्रोसेसिग यूनिट लगाई गई थी। शुरुआत में कुछ दिनों तक यहां कामकाज भी हुआ। इसके बाद कच्चे माल की आवक कम होने की बात कहते यह कारोबार बंद हो गया। धीरे-धीरे इन यूनिटों ने दम तोड़ दिया। काजू के प्रोसेसिंग व इससे मुनाफा कमाने के लिए फिलहाल राजनगर, कोलचूर व करमरी में महिला समूहों ने प्रोजेक्ट लगाए हैं। यहां पर कामकाज भी शुरू हो गया है। करमरी की समूह संचालिका रुकमणी ने बताया कि बीते साल 13 हजार रुपए प्रति क्विंटल के भाव से काजू नट खरीदा था, प्रोसेसिंग के बाद आठ सौ रूपए प्रति किलो की दर से ग्राहकों को काजू बेच रहे हैं।

काजू से हो सकती है बेहतर आमदनी

बस्तर की आबोहवा काजू के लिए मुफीद है। कृषि कालेज अच्छी गुणवत्ता के लिए वेंगुरला व इंदिरा वेरायटी के पौधे लगाने जरुरी जानकारियां उपलब्ध करा रहा है। इसकी प्रोसेसिंग यहीं होने से अच्छी खासी आमदनी हो सकती है।

डा. विकास रामटेके, कृषि वैज्ञानिक, उद्यानिकी कालेज

इन सुझावों पर अमल की जरूरत

-बस्तर का काजू जैविक होने की वजह से बेहद पौष्टिक व अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा है। इसकी ब्रांडिंग की जरूरत

-काजू प्रोसेसिंग प्लांट के साथ ही तीन अन्य संबंधित यूनिट लगाना होगा। इनमें काजू के बाद इसके कर्नेल से जूस, छीलन से पालिश व इसके बाद बचे रेशे इंधन के तौर पर बेचा जाना चाहिए।

-काजू के संग्रहण का सकल कारोबार संगठित तौर पर किया जाना चाहिए। इसके लिए किसानों को संगठित कर इन्हें इसके वैल्यू एडीशन की जानकारी देनी होगी।